मोह
बैठी इक सखी मृगतृष्णा- सी चाह में सुध- बुध खो करके,
सोच बिलखती अश्रु धरा पर प्रिय की निशानी साथ ले करके।
कहती जी न सकूंगी अब प्रिय का वियोग दु:ख ले करके,
प्रिय वियोग में झुलस रही वो इक क्षणिक आनंद को खो करके।
मोह विवशता देखो इसकी आश लगाये
व्यथित हो करके,
प्रिय के वियोग में तङप रही वो एक अभागन मीन हो करके।
मोह के वशीभूत वियोग में तङपती असहाय स्त्री।
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