नारी

नये रंग की सुबह को लेकर चली एक नारी जग में।
करने चली साकार वो सपने बुने जो उसने रात भर में।
मन का साहस, दिल में राहत, बांध के मुठ्ठी चली जग में।
हृदय भूमि में प्रेम वृक्ष को सींच चली वन - उपवन में।
सहसा एक अचानक घटना घटित हुई निज जीवन में। 
दुर्बल और असहाय समझती जीवन के संग्रामों में। 
मिली एक उम्मीद उसे जो लगती थी निज ख उर में। 
बांध हौंसला बढती आगे स्वप्न स्वयं सच करने में। 
किया जो उसने कठिन परिश्रम स्वयं को साबित करने में। 
सफल हुई जब मेहनत उसकी तो नृत्य करत हर्षी उर में। 
मन में प्रयत्न निरंतर करती , नवीन स्वप्न सच करने में। 
विजयगान की विजय पताका लहराती वो जग भर में।

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