बोलूँ क्या

मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या,
जो सोचा फिर अब बोलूं क्या

शिकायत इक मैं कर लूं क्या
तुम चाहो तो कुछ बोलूं क्या
बहुत दिन हो गये अब मिल लूं क्या 
जो मांगो अब मैं दे दूं क्या
मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या
जो सोचा फिर अब बोलूं क्या

कैद तुम्हारी यादें हैं अब मैं इनको खोलूं क्या
पत्र तुम्हारे बहुत रखे हैं अब मैं फिर से पढ लूं क्या
कलम भी रूठ रही है मुझसे इसको अब खुश कर लूं क्या
गम में तेरी चीख रहे सब इनको मैं चुप कर लूं क्या
मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या
जो सोचा फिर अब बोलूं क्या

सीख लिया है मैंने रहना सोचा तुम्हें बता दूं क्या
सीख लिया है मैंने चलना सोचा तुम्हें सिखा दूं क्या
भूल चुके हैं गम के रस्ते फिर से अब मैं रोलूं क्या 
खोल हृदय के राज घनेरे तुमसे फिर अब मिल लूं क्या
मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या
जो सोचा फिर अब बोलूं क्या

Comments

  1. मुझे लग रहा है कि बोल देना चाहिए

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