एक क्षण किशोरावस्था का

किशोरावस्था के दौरान जब फिसलती गई,
वो कामुकता की दल-दल में।
अंधकार से भरी धुप्प दुनिया में बढते गये कदम,
लौट न सके फिर कभी।
शायद ये किसी विशेष के लिए हो सुखानुभूति,
किन्तु एक स्त्री के लिए होती सदैव चरित्रहीनता।
मर्द और औरत के मध्य अकस्मात हुई वार्ता, 
समाज में इस तरह परोसी जायेगी विश्वास नहीं होता। 
किशोरावस्था में कदम इतना फिसलेंगे विश्वास नहीं होता, 
आश्चर्य है बंद दुनिया का स्वतंत्र रूप। 
जहाँ प्रत्येक रंग, कला, भाव, विचार सबकुछ, 
एक-दूसरे से कोशों दूर विभक्त हैं। 
ममत्व की चाह, विश्वास की अनुभूति, संवेदना के कुछ शब्द, आपसी अनकहे रिश्ते 
दुनिया के लिये हमेशा, 
निष्कलंक हो जरूरी तो नहीं। 
काश ये जीवन एक-दूसरे के विचारों के अनुरूप चलने के अधीनस्थ न होता।

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