भय दुनिया का

सहम- सी गई है आज दुनिया न जाने क्यों
एक डर है अजीब - सा
मृत्यु का मंजर है कि रुकता ही 
 नहीं
स्वजनों का शोक हिला देता है 
अंतस की हर एक दीवार 
चाह उठती है मदद की 
तो हाथ पीछे खींच लेती है 
अपनी ही सुरक्षा 
न जाने क्यों आज इंसान खुद इंसान का दुश्मन बन गया

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