एक रात वो भयानक आई थी, घोर अंधेरा साथ था उसके, पर कुछ सिखलाने वो आई थी, बिजली चमकी बादल गरजे तूंफा भी तो साथ था उसके, हाथ में अपने साथ वो लेकर सीख अजब-सी लाई थी, सीख भरोसा साथ था उसके, बस वो देने आई थी, वो रात भयानक आई थी।
संगीत के सुरों का वो राग हो तुम, भटके हुए पथिक का ध्रुव तारा हो तुम, जिंदगी का अनूठा साज हो तुम, इस समाज का बेशकीमती ताज हो तुम, मन का सजाया वो रंगीन ख्वाब हो तुम, सुनसान अंधेरों में रोशन प्रकाकाश हो तुम, अंतस का अटूट विश्वास हो तुम, न जाने कौन हो मेरे तुम
आज तुम नहीं बस तुम्हारी पहचान बाकी है, यादों के हर सफर में एक याद बाकी है, लफ्जों के हर अश्क में वो प्यार बाकी है, अब तुम नहीं पर तुम्हारी याद बाकी है।
संवेदना का एक दीप जलाना आज है, अंधेरा जो घना है, मिटाना आज है। फैली है जो नफरत इस दुनिया में बहुत, इस नफरत को मिटाना जरूरी आज है। निरक्षरता समाज की दीमक जो लिपटी आज है, साक्षरता की सुनहरी चमक से हटाना आज है। रोशन हो भविष्य आने वाली पीढ़ी का, तो समृद्धि का जोर लगाना आज है। संवेदना का एक दीप जलाना आज है।