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Showing posts from October, 2021

बोलूँ क्या

मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या, जो सोचा फिर अब बोलूं क्या शिकायत इक मैं कर लूं क्या तुम चाहो तो कुछ बोलूं क्या बहुत दिन हो गये अब मिल लूं क्या  जो मांगो अब मैं दे दूं क्या मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या जो सोचा फिर अब बोलूं क्या कैद तुम्हारी यादें हैं अब मैं इनको खोलूं क्या पत्र तुम्हारे बहुत रखे हैं अब मैं फिर से पढ लूं क्या कलम भी रूठ रही है मुझसे इसको अब खुश कर लूं क्या गम में तेरी चीख रहे सब इनको मैं चुप कर लूं क्या मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या जो सोचा फिर अब बोलूं क्या सीख लिया है मैंने रहना सोचा तुम्हें बता दूं क्या सीख लिया है मैंने चलना सोचा तुम्हें सिखा दूं क्या भूल चुके हैं गम के रस्ते फिर से अब मैं रोलूं क्या  खोल हृदय के राज घनेरे तुमसे फिर अब मिल लूं क्या मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या जो सोचा फिर अब बोलूं क्या

एक शाम उनकी

एक शाम रोज मैं घर से निकल जाता हूँ यादों के कई गुब्बार मैं वहाँ खाली कर आता हूँ कुछ नई कुछ पुरानी यादों को बिखेर आता हूँ एक शाम रोज मैं घर से निकल जाता हूँ छोङ आता हूँ कुछ हसीन फल उन अनजान राहों के याद कर कुछ लम्हे साथ बटोर लाता हूँ वक्त जब मिला करता हूँ याद उनकी बातों को वैसे तो उनकी हर बात को अपने जेहन में समेट लाता हूँ एक शाम रोज मैं घर से निकल जाता हूँ

चांदनी रात

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मिल गई

कल जो मन्नत मांगी थी, आज वो जन्नत में बदल गई। रोशन चांद के उजाले में वो सूरत मिल गई, खुदा से जो चाही वो बरकत मिल गई । इश्क की तहजीब में वो आरजू मिल गई, सजदे में उनके हिफाजत मिल गई ।

आई दिवाली

अंधकार की रात अंधेरी दूर हटाने आई दिवाली, रोशन दिन की सहर को लेकर जग में आई नयी दिवाली।  बांध के मुठ्ठी कमर को कसके बैर मिटाने आई दिवाली, रोशन दिन की सहर को लेकर जग में आई नयी दिवाली। 

नारी

नये रंग की सुबह को लेकर चली एक नारी जग में। करने चली साकार वो सपने बुने जो उसने रात भर में। मन का साहस, दिल में राहत, बांध के मुठ्ठी चली जग में। हृदय भूमि में प्रेम वृक्ष को सींच चली वन - उपवन में। सहसा एक अचानक घटना घटित हुई निज जीवन में।  दुर्बल और असहाय समझती जीवन के संग्रामों में।  मिली एक उम्मीद उसे जो लगती थी निज ख उर में।  बांध हौंसला बढती आगे स्वप्न स्वयं सच करने में।  किया जो उसने कठिन परिश्रम स्वयं को साबित करने में।  सफल हुई जब मेहनत उसकी तो नृत्य करत हर्षी उर में।  मन में प्रयत्न निरंतर करती , नवीन स्वप्न सच करने में।  विजयगान की विजय पताका लहराती वो जग भर में।

मोह

बैठी इक सखी मृगतृष्णा- सी चाह में सुध- बुध  खो करके, सोच बिलखती अश्रु धरा पर प्रिय की निशानी साथ ले करके। कहती जी न सकूंगी अब प्रिय का वियोग दु:ख ले करके, प्रिय वियोग में झुलस रही वो इक क्षणिक आनंद को खो करके। मोह विवशता देखो इसकी आश लगाये व्यथित हो करके, प्रिय के वियोग में तङप रही वो एक अभागन मीन हो करके।