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भय दुनिया का

सहम- सी गई है आज दुनिया न जाने क्यों एक डर है अजीब - सा मृत्यु का मंजर है कि रुकता ही   नहीं स्वजनों का शोक हिला देता है  अंतस की हर एक दीवार  चाह उठती है मदद की  तो हाथ पीछे खींच लेती है  अपनी ही सुरक्षा  न जाने क्यों आज इंसान खुद इंसान का दुश्मन बन गया

एक क्षण किशोरावस्था का

किशोरावस्था के दौरान जब फिसलती गई, वो कामुकता की दल-दल में। अंधकार से भरी धुप्प दुनिया में बढते गये कदम, लौट न सके फिर कभी। शायद ये किसी विशेष के लिए हो सुखानुभूति, किन्तु एक स्त्री के लिए होती सदैव चरित्रहीनता। मर्द और औरत के मध्य अकस्मात हुई वार्ता,  समाज में इस तरह परोसी जायेगी विश्वास नहीं होता।  किशोरावस्था में कदम इतना फिसलेंगे विश्वास नहीं होता,  आश्चर्य है बंद दुनिया का स्वतंत्र रूप।  जहाँ प्रत्येक रंग, कला, भाव, विचार सबकुछ,  एक-दूसरे से कोशों दूर विभक्त हैं।  ममत्व की चाह, विश्वास की अनुभूति, संवेदना के कुछ शब्द, आपसी अनकहे रिश्ते  दुनिया के लिये हमेशा,  निष्कलंक हो जरूरी तो नहीं।  काश ये जीवन एक-दूसरे के विचारों के अनुरूप चलने के अधीनस्थ न होता।

जन्मदिन से संघर्ष तक

कितने सुरक्षित होते हैं हम अपनी मां की कोख में, बाहरी दुनिया के अनुचित क्रियाकलापों से। होता है वो अनुभव और स्नेह साथ, जो बना देता है हमें एकदम साहसी। बाहरी दुनिया से रुबरू होने वाले,  पहले और बाद के संघर्षों के लिए। जब आते हैं हम इस दुनिया में, अनेक संघर्षों का सामना कर। तब आती है असहनीय पीढा से गुजरी,  हमारी मां के चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान। खिल जाता है वो हर एक चेहरा और होती है तैयारी जश्न की हमारे 'जन्मदिन' की। मिलते हैं शुभाशीष हमें स्वजनों के,  भर जाते हैं हम आत्मीय भावनाओं से। हम बनते हैं साहसी, निडर, कठोर, हृदय की कोमल भावनाओं को साथ लिए असीम प्रेम और विश्वास, समझ जैसी कई अनुभूतियाँ लिए बाहरी दुनिया के संघर्षों के लिए।

स्पर्श

तुमने बिना छुये मेरे दिल को छुआ है, ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है। संवेदनाओं और अहसासों को एक नया मोड़ मिला है, मन आशियाने को सुकूं अनकहा मिला है ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है। आंखों में बसता मासूम-सा चेहरा खिला है, गुलदान में मानो एक नया गुल खिला है ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है। किताबों के पन्नों में नया एक अध्याय मिला है, जिंदगी में एक नया आयाम मिला है तुमने बिना छुये मेरे दिल को छुआ है ऐसा मेरे साथ शायद पहली बार हुआ है।

दीपोत्सव

दीपोत्सव से मनी दिवाली,               जग - मग, जग - मग रोशन जग में  खुशियाँ लाई कोटि - कोटि की,                 श्रीराम की भव्य अगवानी में।  महावीर जब मोक्ष सिधारे,              मन मंदिर हर्षित उर में जग सारा खुशहाल हो गया,              तमस स्वयं हर लेने में। रोम - रोम हर्षित हो जाता,              स्वर्णमयी उज्जवल क्षण में बैर, क्रोध जब मिट जाता तो,              प्रेम वृक्ष खिलता उर  में। दीपोत्सव से मनी दिवाली,              जग - मग, जग - मग रोशन जग में।

बोलूँ क्या

मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या, जो सोचा फिर अब बोलूं क्या शिकायत इक मैं कर लूं क्या तुम चाहो तो कुछ बोलूं क्या बहुत दिन हो गये अब मिल लूं क्या  जो मांगो अब मैं दे दूं क्या मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या जो सोचा फिर अब बोलूं क्या कैद तुम्हारी यादें हैं अब मैं इनको खोलूं क्या पत्र तुम्हारे बहुत रखे हैं अब मैं फिर से पढ लूं क्या कलम भी रूठ रही है मुझसे इसको अब खुश कर लूं क्या गम में तेरी चीख रहे सब इनको मैं चुप कर लूं क्या मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या जो सोचा फिर अब बोलूं क्या सीख लिया है मैंने रहना सोचा तुम्हें बता दूं क्या सीख लिया है मैंने चलना सोचा तुम्हें सिखा दूं क्या भूल चुके हैं गम के रस्ते फिर से अब मैं रोलूं क्या  खोल हृदय के राज घनेरे तुमसे फिर अब मिल लूं क्या मैं तुमसे अब कुछ बोलूं क्या जो सोचा फिर अब बोलूं क्या

एक शाम उनकी

एक शाम रोज मैं घर से निकल जाता हूँ यादों के कई गुब्बार मैं वहाँ खाली कर आता हूँ कुछ नई कुछ पुरानी यादों को बिखेर आता हूँ एक शाम रोज मैं घर से निकल जाता हूँ छोङ आता हूँ कुछ हसीन फल उन अनजान राहों के याद कर कुछ लम्हे साथ बटोर लाता हूँ वक्त जब मिला करता हूँ याद उनकी बातों को वैसे तो उनकी हर बात को अपने जेहन में समेट लाता हूँ एक शाम रोज मैं घर से निकल जाता हूँ

चांदनी रात

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मिल गई

कल जो मन्नत मांगी थी, आज वो जन्नत में बदल गई। रोशन चांद के उजाले में वो सूरत मिल गई, खुदा से जो चाही वो बरकत मिल गई । इश्क की तहजीब में वो आरजू मिल गई, सजदे में उनके हिफाजत मिल गई ।

आई दिवाली

अंधकार की रात अंधेरी दूर हटाने आई दिवाली, रोशन दिन की सहर को लेकर जग में आई नयी दिवाली।  बांध के मुठ्ठी कमर को कसके बैर मिटाने आई दिवाली, रोशन दिन की सहर को लेकर जग में आई नयी दिवाली। 

नारी

नये रंग की सुबह को लेकर चली एक नारी जग में। करने चली साकार वो सपने बुने जो उसने रात भर में। मन का साहस, दिल में राहत, बांध के मुठ्ठी चली जग में। हृदय भूमि में प्रेम वृक्ष को सींच चली वन - उपवन में। सहसा एक अचानक घटना घटित हुई निज जीवन में।  दुर्बल और असहाय समझती जीवन के संग्रामों में।  मिली एक उम्मीद उसे जो लगती थी निज ख उर में।  बांध हौंसला बढती आगे स्वप्न स्वयं सच करने में।  किया जो उसने कठिन परिश्रम स्वयं को साबित करने में।  सफल हुई जब मेहनत उसकी तो नृत्य करत हर्षी उर में।  मन में प्रयत्न निरंतर करती , नवीन स्वप्न सच करने में।  विजयगान की विजय पताका लहराती वो जग भर में।

मोह

बैठी इक सखी मृगतृष्णा- सी चाह में सुध- बुध  खो करके, सोच बिलखती अश्रु धरा पर प्रिय की निशानी साथ ले करके। कहती जी न सकूंगी अब प्रिय का वियोग दु:ख ले करके, प्रिय वियोग में झुलस रही वो इक क्षणिक आनंद को खो करके। मोह विवशता देखो इसकी आश लगाये व्यथित हो करके, प्रिय के वियोग में तङप रही वो एक अभागन मीन हो करके। 

सीख

एक रात वो भयानक आई थी, घोर अंधेरा साथ था उसके, पर कुछ सिखलाने वो आई थी, बिजली चमकी बादल गरजे तूंफा भी तो साथ था उसके, हाथ में अपने साथ वो लेकर सीख अजब-सी लाई थी, सीख भरोसा साथ था उसके, बस वो देने आई थी, वो रात भयानक आई थी।

तुम

संगीत के सुरों का वो राग हो तुम, भटके हुए पथिक का ध्रुव तारा हो तुम,  जिंदगी का अनूठा साज हो तुम,  इस समाज का बेशकीमती ताज हो तुम,  मन का सजाया वो रंगीन ख्वाब हो तुम, सुनसान अंधेरों में रोशन प्रकाकाश हो तुम,  अंतस का अटूट विश्वास हो तुम,  न जाने  कौन हो मेरे  तुम

याद

आज तुम नहीं बस तुम्हारी पहचान बाकी है, यादों के हर सफर में एक याद बाकी है,  लफ्जों के हर अश्क में वो प्यार बाकी है,  अब तुम नहीं पर तुम्हारी याद बाकी है। 

Love

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Love is a heartbeat of loving couple. It's proof that they lives in together in whole life and never separate. Love is a most powerful bond...  love

संवेदना

संवेदना का एक दीप जलाना आज है, अंधेरा जो घना है, मिटाना आज है। फैली है जो नफरत इस दुनिया में बहुत, इस नफरत को मिटाना जरूरी आज है। निरक्षरता समाज की दीमक जो लिपटी आज है, साक्षरता की सुनहरी चमक से हटाना आज है। रोशन हो भविष्य आने वाली पीढ़ी का, तो समृद्धि का जोर लगाना आज है। संवेदना का एक दीप जलाना आज है।